राजनीति अब जन सेवा नहीं, आवश्यकता को अवसर में बदलती है, और खूब फलती फूलती है

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आज के परिदृश्य में राजनीति जन सेवा नहीं बल्कि जनता द्वारा अपनी सेवा करवाती है, आज के राज नेता जन नेता नहीं बल्कि अवसरवादी नेता हो गये हैं, आज के परिपेक्ष्य में नेता राजनीतिक दल की विचारधारा को कब तार तार कर दे और फिर कब किस अवसर पर उस तार से खुद को लपेट ले यह कह नहीं सकते हैं। राजनीति में अब विचारधारा से कोई संबंध नहीं रह गया है। अब राजनीति अवसर को आवश्यकता में बदलती है तब जननेता दल बदलने में गुरेज नहीं करते हैं।
राष्ट्रीय दल हो या क्षेत्रीय दल उनसे जुड़े नेता समयानुसार खुद को दल बदलने में देर नहीं लगाते हैं, क्योंकि राजनीति का स्वाद जब एक बार लग जाता है तो वह जाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि आज के समय में राजनीति एक चोखा व्यवसाय बन गया है, जितनी जेब से लगता है, उतना जेब में भी आ जाता है। इसलिए आज के युवा पीढी राजनीति के चकाचौंध में नौकरी व्यवसाय छोड़कर युवा नेता बनने के हसीन ख्वाब पाल बैठते हैं। पहले राजनीति 60 साल बाद की परिपक्व मानी जाती थी, लेकिन अब कॉलेज के समय से ही राजनीति में परिपक्वता समझी जाने लगी है। देश हो या राज्य अब नेता पार्टी बदलने में गुरेज नहीं करते हैं, क्योंकि अवसरवाद की राजनीति का चलन हो चुका है। पहले नेताओं का इमान धर्म होता था, अब इमान धर्म वाला नेता नहीं बन सकता है, क्योंकि इमान धर्म को गिरवी रखकर ही तो नेता बना जाता है।
आज का नेता जिस दल की सदस्यता ग्रहण किये हुए है, वह विपक्ष या अन्य दल को पानी पी पीकर कोसता है, और जब उस दल में उसे अवसर नहीं मिलता है, तो वह विपक्ष में जाकर शामिल हो जाता है, फिर वह जिसे पानी पीकर कोसता था उसका वह गुणगान करता नहीं फिरता है, यह उसकी आवश्यकता है, उसकी मजबूरी है, क्योंकि उसने राजनीति का स्वाद चखा ही नहीं बल्कि उसके रोम रोम में बस चुका है, इसलिए उसके लिए दल बदलना यानी चोला बदलने के समान है, उसके लिए जन हित ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं बन जाते हैं, बल्कि उसके लिए स्वहित ज्यादा जरूरी होते हैं।
अतः वर्तमान परिदृश्य में किसी भी नेता या राजनेता का दल बदल करना या फिर दल की बुराई करना कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि उसके लिए अवसर है, और आवश्यकता को अवसर में बदलने वाला नेता ही आज के समय में सबसे सफल नेता होता है। इसलिए जनता को इनके आने जाने पर अफसोस व्यक्त करना अपना समय को बरबाद करना है। आज के परिपेक्ष्य में दल बदल करना मतबल किराये का मकान बदलना है, और सभी मकान मालिकों के साथ मिलकर शाम के समय दावत पानी करना है। इसलिए राजनीति अब जन सेवा नहीं, आवश्यकता को अवसर में बदलती है, और खूब फलती फूलती है।

Mankhi Ki Kalam se

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